Exclusive: हमेें शक की नजर से देखते हैंं, बर्बर है उनकी जन अदालत

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03 Dec , 2018

2005 से 2014 तक थ्री नॉट थ्री बंदूक के साथ नक्सली बनकर जीवन गुजारने वाली शांति बताती है कि अंदर की जिंदगी किसी नर्क से कम नहीं है। नक्सली हमसे मुफ्त की बेगारी करवाते थे। ना टाइम पर खाना मिला ना टाइम पर पीने के लिए पानी। वे केवल हमें वर्दी और बंंदूक देते हैं। हम जंगलों में मीलों चलते थे, आराम की इजाजत नहीं होती थी। हम ये क्यों कर रहे थे, इसके बारे में कुछ भी स्पष्ट नहीं था। बस हमें कहा जाता था कि सरकार यहां आने वाली है, तुमसे सबकुछ लूट कर ले जाएगी। अपनी संपत्ति को बचाना है तो हमें एक होकर लड़ना पडेगा। बस यही बात सुनकर मैं भी उनके दल में शामिल हो गई। दूसरे आदिवासी भी इसी बहकावे में आकर ही उनके साथ जा रहे हैं। लेकिन अंदर की हकीकत कुछ और ही है। शांति बताती है कि वे कहते हैं कि महिलाओं के लिए भी एकाधिकार लाना है। आदिवासियों को उनका हक दिलाना है। लेकिन दोनों ही बातों में माओवादियों नेे वादा खिलाफी की है। महिलाओं के अधिकार के मामले में वे बेहद दकियानूसी हैं। महिलाओं को बच्चे पैदा करने का अधिकार वे नहीं देते। बड़े पद नहीं देते। निर्णय करने का अधिकार भी नहीं देते। शांति भावुक हो जाती हैं, वे कहती हैं कि.. रही बात आदिवासियों की, तो उनकी सेंट्रल कमेटी या पोलित ब्यूरो में आज तक किसी भी आदिवासी को पद नहीं दिया गया। वहां सबके सब आंध्र कैडर के नक्सली नेता हैं। 

Priyanka Kaushal

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